23 मार्च महज एक तारीख नही है, एक घटना मात्र नही है | बल्कि भारतीय इतिहास का वो अध्याय है जिसका प्रभाव आज भी उतना ही ताजा है जितना की 23 मार्च 1931 को रहा होगा| यह वही दिन है जिसको अब तक भारत कोई नाम नही दे पाया है| क्योंकि गर इसे *शहीद दिवस* कह कर , भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव की शहादत को नमन किया जाये तो ये अन्याय होगा इन शहीदों के उस स्वप्न से जो कि एक भगत सिंह मर कर भारत के हर युवा को भगत सिंह कर देगा|
इसलिए यह दिन, शहादत से कई अधिक क्रान्ति का प्रतीक है!
एक ऐसी क्रांति जो साम्य हो| बल व लहू के न्यूनतम रिसाव और सकारात्मक सोच की दूरदृष्टि का प्रतिफल हो|
यह क्रांति महज मेरे लिए ना हो, महज तुम्हारे लिए ना हो, महज हमारे लिए ना हो अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए, पूर्ण विश्व के लिए हो|
इस क्रांति का दायरा हर सरहद से परे, हर कौम से बड़ा हो|
यह क्रान्ति किसान के खेतों की मेड़ों से लेकर फैक्ट्रियों की रीढ़ में जड़े मजदूर के पसीने की बूंद तक महके|
इस क्रान्ति का मर्म उत्पादन नही, हर जीवन में उत्साह, उमंग, उम्मीदों को बढ़ावा देना हो|
और ये मै नही कह रही! ये कह रहा था वो युवक, जिसने इन्कलाब को नयी परिभाषाएं दी, *दुनिया भर के मजदूरों एक हो जाओ* जैसे नारे दिये| दूसरों के उत्थान की जगह अपने पतन की फिक्र करने को कहा, हिंसा - अहिंसा के दुर्गम मार्गों के मध्य के संतुलित मार्ग की नीव रखी|
जो चाहता था कि अत्याचार जो हो, जैसा हो, जिसके कारण हो, जहाँ हो, जड़ से खत्म हो जाना चाहिए!
परंतु हमने याद क्या रखा? उसका नाम? कुछ घटनायें और
-महज वो फाँसी?
जबकि याद तो यह रखना था कि वो फांसी निर्धारित समय से पहले ही दे दी गई थी, सूर्य अस्त उपरांत (शाम 7:30 बजे) दी जाने वाली ये शायद अभूतपूर्व फांसी थी|
पर क्यों? क्यों गांधी-इरविन की मुलाकात के फलस्वरूप जारी
स्टे आॅडर के पहुंचने से पहले ही इन क्रांतिकारियों को ठिकाने लगा देना जरूरी समझा गया?
-हमने याद रखा महज उस खत का कहना कि *मेरी दुल्हन तो आज़ादी है*
जबकि हम यह भूल गए कि वो दुल्हन दिखती कैसी थी !!
और
-हमने रटी कुछ शायरियाँ !!
जबकि सोचना यह था कि उन पंक्तियों के आगे क्या लिखें??
निन्दनीय है कि हमने लीक से हटकर लड़े लड़ाकों को एक पंक्ति में खड़ा कर पूजनीय शहीदों का दर्जा थमा कर मृत कर दिया! आज हम आए दिन सरकार से माँग करते हैं, कि भगत सिंह को भारत रत्न दो! उसकी तस्वीर नोट पे छापो! पर इससे क्या हासिल होगा? क्या समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, अत्याचार खत्म हो जाएगा? या HSRA के पर्चों में छपने वाले विचारों को रूप मिल जायेगा ?
लाला लाजपत राय का बदला लेते हुए और असेंबली में इन्कलाब को आवाज़ देने के बाद HSRA के नोटिस में छपा था,
*it is easy to kill individuals but you cannot kill the ideas*
पर आज कि स्थिति चिंतनीय है कि हमें केवल वो नाम ही याद हैं, व्यक्तित्व हम भूल गए|
"यह लेख कोई श्रद्धांजलि नही! एक प्रयास था *बहरों के सुनने के लिए* कि क्रांति दिवस को छति दिवस मत बनाओ!! "
उत्थिष्ठ भा रत_/\_
इसलिए यह दिन, शहादत से कई अधिक क्रान्ति का प्रतीक है!
एक ऐसी क्रांति जो साम्य हो| बल व लहू के न्यूनतम रिसाव और सकारात्मक सोच की दूरदृष्टि का प्रतिफल हो|
यह क्रांति महज मेरे लिए ना हो, महज तुम्हारे लिए ना हो, महज हमारे लिए ना हो अपितु सम्पूर्ण मानवता के लिए, पूर्ण विश्व के लिए हो|
इस क्रांति का दायरा हर सरहद से परे, हर कौम से बड़ा हो|
यह क्रान्ति किसान के खेतों की मेड़ों से लेकर फैक्ट्रियों की रीढ़ में जड़े मजदूर के पसीने की बूंद तक महके|
इस क्रान्ति का मर्म उत्पादन नही, हर जीवन में उत्साह, उमंग, उम्मीदों को बढ़ावा देना हो|
और ये मै नही कह रही! ये कह रहा था वो युवक, जिसने इन्कलाब को नयी परिभाषाएं दी, *दुनिया भर के मजदूरों एक हो जाओ* जैसे नारे दिये| दूसरों के उत्थान की जगह अपने पतन की फिक्र करने को कहा, हिंसा - अहिंसा के दुर्गम मार्गों के मध्य के संतुलित मार्ग की नीव रखी|
जो चाहता था कि अत्याचार जो हो, जैसा हो, जिसके कारण हो, जहाँ हो, जड़ से खत्म हो जाना चाहिए!
परंतु हमने याद क्या रखा? उसका नाम? कुछ घटनायें और
-महज वो फाँसी?
जबकि याद तो यह रखना था कि वो फांसी निर्धारित समय से पहले ही दे दी गई थी, सूर्य अस्त उपरांत (शाम 7:30 बजे) दी जाने वाली ये शायद अभूतपूर्व फांसी थी|
पर क्यों? क्यों गांधी-इरविन की मुलाकात के फलस्वरूप जारी
स्टे आॅडर के पहुंचने से पहले ही इन क्रांतिकारियों को ठिकाने लगा देना जरूरी समझा गया?
-हमने याद रखा महज उस खत का कहना कि *मेरी दुल्हन तो आज़ादी है*
जबकि हम यह भूल गए कि वो दुल्हन दिखती कैसी थी !!
और
-हमने रटी कुछ शायरियाँ !!
जबकि सोचना यह था कि उन पंक्तियों के आगे क्या लिखें??
निन्दनीय है कि हमने लीक से हटकर लड़े लड़ाकों को एक पंक्ति में खड़ा कर पूजनीय शहीदों का दर्जा थमा कर मृत कर दिया! आज हम आए दिन सरकार से माँग करते हैं, कि भगत सिंह को भारत रत्न दो! उसकी तस्वीर नोट पे छापो! पर इससे क्या हासिल होगा? क्या समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार, अत्याचार खत्म हो जाएगा? या HSRA के पर्चों में छपने वाले विचारों को रूप मिल जायेगा ?
लाला लाजपत राय का बदला लेते हुए और असेंबली में इन्कलाब को आवाज़ देने के बाद HSRA के नोटिस में छपा था,
*it is easy to kill individuals but you cannot kill the ideas*
पर आज कि स्थिति चिंतनीय है कि हमें केवल वो नाम ही याद हैं, व्यक्तित्व हम भूल गए|
"यह लेख कोई श्रद्धांजलि नही! एक प्रयास था *बहरों के सुनने के लिए* कि क्रांति दिवस को छति दिवस मत बनाओ!! "
उत्थिष्ठ भा रत_/\_
JAI HIND __/\__
ReplyDeleteजय हिन्द!!
Deleteधमाके के शोर ने बैचेन कर दिया, नये विचारों का उद्गम हो रहा हैं , धन्यवाद ! और ये धमाके निरंतर जारी रहने चाहिये, हमे जागकर वापस सो जाने की बुरी आदत हैं !
ReplyDeleteबहुत सही कहा.. बृजेश जी! सपने देखने लिए ही हम जागते रहे फिर वापस सो गए!
Delete*पर अब यह चक्रव्यूह तोड़ना होगा*
हिला दो असामनता के पहरो को
ReplyDeleteसुना दो अपना नाद उन बहरो को
हिला दो असामनता के पहरो को
ReplyDeleteसुना दो अपना नाद उन बहरो को
वाह!!
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