भारतीय संविधान, केवल नियमावली नही है.. यह वह जीवन मार्ग है, जिसे भारत ने अपनाया है|
और महत्वपूर्ण बात है कि इसे भारत ने ही बनाया है| 19वीं सदी में ही *स्वराज विधेयक* में तिलक ने अपनी दूरदर्शिता का प्रमाण देते हुए, संविधान सभा की इच्छा प्रकट कर दी थी! उसके बाद 20वीं सदी में महात्मा गांधी ने यह कर संविधान का स्वदेशिकरण स्पष्ट कर दिया कि,
*भारत का संविधान भारतीयों की इच्छानुसार ही होगा*
अंत: 9 दिसंबर 1946 से शुरू कर 26 नवंबर 1949 को *हमने* संविधान बना ही लिया!
हाँ, हमने ही बनाया, तभी तो संविधान का पहला शब्द ही *हम* है| *हम भारत के लोग..... *
उल्लेखनीय है कि जो भाव 19वीं सदी में रख दिया उसे हर पड़ाव पर संभाला जाता रहा.., हमने संविधान से हम नही जाने दिया | परंतु आज स्थिति मुझे दयनीय लगती है, जब हम मे से ही कई लोग, संविधान को केवल संविधान सभा की गलतियों का जमावड़ा समझते हैं|
मै इस सोच को जन्मजात भी नही कहा सकती क्योंकि यह स्पष्ट है कि ये सोच वर्तमान में फैले हाहाकार की उपज है, परंतु इसे जायज कहना भी एक नये हाहाकार की ओर बढ़ना है..!
असल में जो लोग बात बात पर संविधान को खसोट रहे होते हैं उनमे से सभी ने संविधान को ना पढ़ा होता ना समझा होता है| वे केवल कुछ नकारात्मक विचारकों, बुद्धिजीवियों के तर्क पकड़ कर बैठ गये होते हैं! यह कुछ उसी तरह है कि कोई चीज खरीदते हुऐ हम उसके reviews पर ध्यान देते हैं और यह शायद मानव स्वभाव है कि नकारात्मक प्रतिक्रियाएं जादा असर छोड़ती हैं|
इसका बहुचर्चित उदहारण भारत के संविधान को *copy-paste* मानने वालों का है.., हमे पढ़ाया ही यही जाता है कि हमने ये यहाँ से लिया है वो वहाँ से.., पर यह नही दिखाया जाता कि कैसे अपने रंग ढाल के लिया|
अनुच्छेद 14 ही देख लीजिए,
कानून के समक्ष समानता
और
कानून का समान संरक्षण!
इसमें ज्यादातर लोग केवल समान व कानून शब्द पर अटक जाते हैं यह सोचते ही नही कि एक ही बात दो बार नही कही गई है बल्कि दोनो बार अलग अलग बातें कहीं गई हैं | कानून के समक्ष समानता का मर्म है कि व्यवस्था सभी के लिए एक-सा कानून बनायेगी और समान संरक्षण का मर्म है कि धनी को धनी व गरीब की गरीबी के अनुसार उसे औचित्यपूर्ण व्यवहार मिलेगा| मालुम हो कि free legal aid जैसे प्रावधान भी भारत में मौजूद हैं, परंतु जागरूकता की कमी, राजनीतिक छल-कपट और निराशावाद के ध्रुवीकरण ने ज्यादातर जरूरतमंदों को इससे वंचित रखा परंतु फिर भी इसे संविधान की गलती नही कहा जा सकता|
इसके अलावा भी कई विवाद हैं..., जैसे भाषा का ही विवाद ले लिजिये| मैने अक्सर लोगों को कहते सुना कि ये संविधान राष्ट्र को एक राष्ट्रीय भाषा भी ना दे सका पर हम ये क्यों भूल जाते हैं कि भारत में एक भाषा बोली भी कहाँ जाती है?? फिर भी चलो हिन्दी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है और संविधान के 15 साल में अंग्रेजी खत्म कर हिन्दी पूर्ण रूप से लागू करने का मजाक तो संसद ने ही बनाया है और संसद हमने!!
खेद है कि हम राजनीतिक पाखंड से लड़ने की जगह संविधान को नाकार के शाँत हो जाते हैं.., चाहे समस्या कश्मीर की हो या आरक्षण की या भ्रष्टाचार की.. हमे केवल संविधान का दोष नजर आता है..|
यह नज़र नही आता कि जब हमारे चुने नेता हमारा गला तक दबा देन चाहते हैं तो संविधान ही हमे बोलने की ताकत देता है!
यह कोई एकमात्र वाक्या नही.., गौर करें तो हमारी सरकारें मौलिक अधिकार भी चून देने को तत्पर रही हैं हमेशा से, पर क्योकि न्यायपालिका के अनुसार आप संविधान की मौलिक आत्मा से छेड़छाड़ नही कर सकते तो मै आज ये blog लिख पा रही हूँ और आप पढ़ पा रहे हैं वर्ना क्या पता कि...??!
खैर, आज संविधान जनक कहे जाने वाले बाबा साहेब के जन्मदिन पर यह तो कह देना चाहिए कि,
यह नकारात्मक सोच उतनी ही जाहिल है जितना बिना धर्म समझे जेहादी हो जाना! क्योंकि जो संविधान संशोधन व न्यायिक पुनर्विलोकन (judicial review) जैसे साधनों से युक्त है उसे आप गलती मानने की गलती कैसे कर सकते हैं??
समय के अनुकूल व न्यायसंगत बने रहना ही भारतीय संविधान की सबसे बड़ी खूबी है.., हाँ यह कहा जा सकता है कि संशोधन तो सांसदों की ही शक्ति है आम जन की नही परंतु खुद को गणराज्य कहने वाले राज्य का गण ही संसद की नीव होता है! यदि हम अपनी बंदूक उपद्रवियों को पकड़ा रहे हैं तो गलती हमारी है बंदूक की नही!
जय हिन्द!
उत्थिष्ठ भा रत!
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